पहली बार बायोफ्यूल से विमान उड़ाकर भारत ने एविएशन इंडस्ट्री में नया मुकाम हासिल कर लिया है। स्पाइजेट ने बॉम्बार्डियर क्यू400 से देहरादून-दिल्ली के बीच इस उड़ान का सफल परीक्षण किया। इसके साथ ही भारत उन खास देशों की श्रेणी में शामिल हो गया, जिन्होंने बायोफ्यूल से किसी प्लेन को उड़ाया है।

विकासशील देशों में यह उपलब्धि हासिल करने वाला भारत पहला देश बन गया है। इस साल की शुरुआत में ही दुनिया की पहली बायोफ्यूल फ्लाइट ने लॉस एंजेलिस से मेलबर्न के लिए उड़ान भरी थी।

अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में कुछ कमर्शियल विमान पहले से जैव ईधन से उड़ान भर रहे हैं। जैव ईधन सब्जी के तेलों, रिसाइकल ग्रीस, काई, जानवरों के फैट आदि से बनता है। जीवाश्म ईधन की जगह इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। दरअसल, एयरलाइंस इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) नामक ग्लोबल एसोसिएशन ने लक्ष्य रखा है कि उनकी इंडस्ट्री से पैदा होने वाले कॉर्बन को 2050 तक 50 प्रतिशत कम किया जाए।

India's first bio fuelled flight Dehradun to Delhi through Spice Jet Plane on 26th August 2018

एक अनुमान के मुताबिक, जैव ईधन के इस्तेमाल से एविएशन क्षेत्र में उत्सर्जित होने वाले कार्बन को 80 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

भारत तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। इसीलिए जैव ईधन को प्रचारित करने की मंशा है।

10 अगस्त 2018 को जैव ईधन दिवस के मौके पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैव ईधन पर राष्ट्रीय नीति जारी की थी। इसमें आनेवाले 4 सालों में एथेनॉल का उत्पादन 3 गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। अगर ऐसा होता है तो तेल आयात के खर्च में 12 हजार करोड़ रुपये तक बचाए जा सकते हैं।

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इस विमान को पहले सोमवार को उड़ान भरनी थी, लेकिन एक दिन पहले ही टेक ऑफ करा दिया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, स्पाइसजेट के चीफ स्ट्रेटजी ऑफिसर जीपी गुप्ता ने कहा कि फ्लाइट रविवार को 6.31 बजे सुबह टेक ऑफ की और 6.53 में लौट आई. उड़ान की निगरानी डीजीसीए की ओर से भी की गई.

2012 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (आईआईपी) ने कनाडा की मदद से वहां बायोफ्यूल से उड़ान का सफल प्रयोग किया था, लेकिन इस बार भारत ने अपने दम पर सफलतापूर्वक प्रयोग पूरा किया। इस 78 सीटर विमान में आईआईपी के निदेशक अंजन रे, केटालिसिस डिविजन की प्रमुख अंशु नानौती, छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल डेवलपमेंट अथॉरिटी के प्रोजेक्ट अफसर सुमित सरकार समेत प्रोजेक्ट से जुड़े तमाम अफसर मौजूद थे।

स्पाइसजेट ने कहा कि उसने बोयोफ्यूल से उड़ान का सफलता से परिचालन पूरा किया। इस उड़ान के लिए इस्तेमाल ईंधन 75 प्रतिशत एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) और 25 प्रतिशत बायोफ्यूल का मिश्रण था। एयरलाइन में बयान में कहा कि एटीएफ की तुलना में बायोफ्यूल इस्तेमाल का फायदा यह है कि इससे कॉर्बन उत्सर्जन घटता है और साथ ही ईंधन दक्षता भी बढ़ती है।  जट्रोफा फसल से बने इस फ्यूल का विकास सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून ने किया है। परीक्षण उड़ान पर करीब 20 लोग सवार थे। इनमें नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) और स्पाइसजेट के अधिकारी शामिल रहे। एयरलाइन के एक अधिकारी ने बताया कि यह उड़ान करीब 25 मिनट की थी।

स्पाइसजेट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अजय सिंह ने कहा कि जैव जेट ईंधन की लागत कम बैठती है और साथ ही यह कॉर्बन उत्सर्जन घटाने में मदद करता है। उन्होंने कहा, 'इसमें हमारी परंपरागत विमान ईंधन पर प्रत्येक उड़ान में निर्भरता में करीब 50 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है। इससे किराये में भी कमी आएगी। जैव जेट ईंधन को अमेरिकी मानक परीक्षण प्रणाली (एएसटीएम) से मान्यता है और यह विमान में प्रैट ऐंड व्हिटनी और बॉम्बार्डियर के वाणिज्यिक एप्लिकेशन के मानदंडों को पूरा करता है।

बायोफ्यूल सब्जी के तेलों, रिसाइकल ग्रीस, काई, जानवरों के फैट आदि से बनता है। जीवाश्म ईंधन की जगह इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। दरअसल, एयरलाइंस इंटरनैशनल एयर ट्रांसपोर्ट असोसिएशन (IATA) नाम की ग्लोबल असोसिएशन ने लक्ष्य रखा है कि उनकी इंडस्ट्री से पैदा होने वाले कॉर्बन को 2050 तक 50 प्रतिशत कम किया जाए। एक अनुमान के मुताबिक, बायोफ्यूल के इस्तेमाल से एविएशन क्षेत्र में उत्सर्जित होनेवाले कार्बन को 80 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। 2012 में पेट्रोलियम विज्ञानी अनिल सिन्हा ने जट्रोफा के बीज के कच्चे तेल से बायोफ्यूल बनाने की टेक्नोलॉजी का पेटेंट कराया। इस फ्लाइट में इस्तेमाल हो रहा फ्यूल उन्हीं की टेक्नोलॉजी व निगरानी में बना है। कर्नाटक बायोफ्यूल डेवलपमेंट बोर्ड के सीईओ रहे वाईबी रामाकृष्ण ने बड़े पैमाने पर बायोफ्यूल तैयार करके दिखाया।

आईआईपी के निदेशक अंजन रे ने कहा- बायोफ्यूल को अपनी ही लैब में तैयार किया गया है। लैब की क्षमता एक घंटे में 4 लीटर बायोफ्यूल बनाने की है। इसके लिए छत्तीसगढ़ में 500 किसानों से जट्रोफा के दो टन बीज लिए गए, जिनसे 400 लीटर फ्यूल बना। इस पर डेढ़ महीने तक 20 लोग दिन-रात काम करते रहे। 300 लीटर बायोफ्यूल के साथ 900 लीटर एटीएफ विमान के राइट विंग में भरा जाएगा। लेफ्ट विंग में 1200 लीटर एटीएफ इमरजेंसी के लिए रहेगा।

2009 में किंगफिशर ने दिलचस्पी दिखाई, लेकिन अपने घाटों की वजह से वह पीछे हट गई। फिर जेट एयरवेज सामने आई। उसके बाद एयर इंडिया ने कोशिश की। इंडिगो ने भी दिलचस्पी दिखाई, लेकिन प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाया। आखिर में स्पाइसजेट तैयार हुई। उसके पास उसी इंजन के प्लेन हैं, जिनमें दूसरे देशों में बायोफ्यूल का सफल प्रयोग हो चुका है।

भारत तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। पीएम मोदी ने भी हाल मे 'नैशनल पॉलिसी फॉर बायोफ्यूल 2018' जारी की थी। इसमें आनेवाले 4 सालों में एथेनॉल के प्रॉडक्शन को 3 गुना बढ़ाने का लक्ष्य है। अगर ऐसा होता है तो तेल आयात के खर्च में 12 हजार करोड़ रुपये तक बचाए जा सकते हैं।

अगर विमान में बायोफ्यूल इस्तेमाल होने लगा तो हर साल 4000 टन कार्बन डाई ऑक्साइड एमिशन की बचत होगी। आपरेटिंग लागत भी 17% से 20% तक कम हो जाएगी।

देश में खेती के लिए 190 मिलियन हेक्टेयर जमीन उपलब्ध है, जबकि सिंचाई सिर्फ 80 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर हो रही है। इसमें 40 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर साल में दो फसलें होती हैं। बाकी 40 मिलियन हेक्टेयर जमीन वाले किसानों के पास बायोफ्यूल के लिए बीज तैयार करने का विकल्प हैं।

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