दुनिया में हर तीसरे सेकंड एक शख्स भुलक्कड़ बनता जा रहा है। भागती-दौड़ती जिंदगी के तनाव, सही खानपान व कसरत की कमी और बढ़ती उम्र जैसे कई कारण हमारी याददाश्त छीनने में लगे हुए हैं। डिमेंशिया के ही एक प्रकार अल्जाइमर में खासतौर से बुजुर्ग धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खोने लगते हैं। हालांकि सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे भी इस बीमारी की गिरफ्त में आने लगे हैं। विश्व अल्जामइर दिवस के मौके पर आइए जानते हैं इस खतरे के बारे में। अल्जाइमर मे जरुरत है अपनों के प्यार और देखभाल की

अल्जाइमर से दिमाग की कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, जिसके कारण याददाश्त, सोचने की शक्ति और अन्य व्यवहार बदलने लगते हैं। इसका असर सामाजिक जीवन पर पड़ता है। बीमारी जब अडवांस्ड स्थिति में पहुंच जाती है, तो मरीज अपने परिजनों और रिश्तेदारों को पहचनाना तक बंद कर देता है. देश में लगभग 16 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं. यह कहना है इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के न्यूरोलोजी विभाग के सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. विनीत सूरी का.

डॉ. सूरी ने 'विश्व अल्जाइमर दिवस (21 सितंबर)’  पर बुधवार को आईएएनएस को जारी एक बयान में कहा कि भारत में लगभग 40 लाख लोग डीमेंशिया से पीड़ित हैं और इसमें अल्जाइमर के मामले सबसे ज्यादा हैं. तकरीबन 16 लाख मरीज अल्जाइमर से पीड़ित हैं.

उन्होंने कहा, अक्सर लोग समझते हैं कि 'डीमेंशिया' और 'अल्जाइमर' एक ही हैं. हालांकि ये दोनों स्थितियां एक नहीं हैं, वास्तव में अल्जाइमर डीमेंशिया का एक प्रकार है. डीमेंशिया में कई बीमारियां शामिल हैं, जैसे अल्जाइमर रोग, फ्रंट टू टेम्पोरल डीमेंशिया, वैस्कुलर डीमेंशिया आदि. डीमेंशिया के मरीजों में शुरुआत में याददाश्त कमजोर होने लगती है और मरीज को रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होने लगती है. मरीज तारीखों, रास्तों और जरूरी कामों को भूलने लगता है. वह घर या ऑफिस में काम करते समय गलत फैसले लेने लगता है.

उन्होंने कहा, मरीज को कुछ नई या हाल ही बातें याद रहने लगती हैं. बीमारी जब अडवांस्ड स्थिति में पहुंच जाती है, तो मरीज अपने परिजनों और रिश्तेदारों को पहचनाना तक बंद कर देता है. उनके व्यवहार में कई तरह के बदलाव आ सकते हैं, जैसे गुस्सा या उग्र व्यवहार करना, मूड में बदलाव आना, दूसरों पर भरोसा न करना, डिप्रेशन, समाज से दूरी बनाना या बेवजह इधर-उधर घूमने की आदत.

अल्जाइमर रोग(Alzheimer's Disease)  'भूलने का रोग' या ‘भूलने की बीमारी’ होती  है। इसका नाम अलोइस अल्जाइमर पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले इसका विवरण दिया।

इस बीमारी के लक्षणों में याददाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना तथा फिर इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थिति आदि शामिल हैं।

अल्जाइमर के कई कारण होते हैं। इसमें सबसे बड़ा रिस्क ऐसे लोगों को होता है जिन्हें पहले से ही डायबिटीज, हाइपरटेंशन, थायराइड और किसी भी तरह की क्रॉनिक डिजीज हो। इसके अलावा अव्यवस्थित जीवनशैली जैसे शराब, सिगरेट, समय से खाना न खाना, तनाव, परिवार में किसी की अल्जाइमर होने की हिस्ट्री। इसके अलावा पोषण संबंधित फैक्टर जैसे विटामिन बी की कमी, अकेलापन, मानसिक रूप से किसी बीमारी से ग्रसित होना।

इस बीमारी की तीन स्टेज होती है। पहली स्टेज यानि एमसीआइ (माइल्ड कांग्नीटिव इम्पेयरमेंट), इसमें हल्की-फुल्की भूलने की समस्या होती है। इसमें व्यायाम, योग और कुछ दवाएं दी जाती हैं। दूसरी स्टेज यानि माइल्ड डिमेंशिया। इसमें एक्सरसाइज के साथ लोगों को क्रिएटिविटी सिखाई जाती है। तीसरी स्टेज यानि मॉडरेट डिमेंशिया जिसमें दवा के साथ, पोषण और परिवार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वहीं चौथी और सीवियर स्टेज, इसमें मरीज पूरी तरह से नर्सिंग केयर पर निर्भर हो जाता है। उसे नहलाने से लेकर, सारे कामों के लिए निर्भर होना पड़ता है इसीलिए अल्जाइमर मे जरुरत है अपनों के प्यार और देखभाल की

समय बीतने के साथ यह बीमारी बढ़ती है और खतरनाक हो जाती है। यह याददाश्त खोने (डीमेंशिया) का सबसे सामान्य रूप है। अन्य बौद्धिक गतिविधियाँ भी कम होने लगती हैं, जिससे प्रतिदिन के जीवन पर असर पड़ता है।

हालाँकि बीमारी के शुरूआती दौर में नियमित जाँच और इलाज से इस पर काबू पाया जा सकता है। मस्तिष्क के स्नायुओं के क्षरण से रोगियों की बौद्धिक क्षमता और व्यावहारिक लक्षणों पर भी असर पड़ता है।

हम जैसे-जैसे बूढ़े होते जाते हैं, हमारी सोचने और याद करने की क्षमता भी कमजोर होती जाती है। लेकिन इसका गंभीर होना और हमारे दिमाग के काम करने की क्षमता में गंभीर बदलाव उम्र बढ़ने का सामान्य लक्षण नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि हमारे दिमाग की कोशिकाएं मर रही हैं। दिमाग में एक सौ अरब कोशिकाएं (न्यूरॉन) होती हैं। हरेक कोशिका बहुत सारी अन्य कोशिकाओं से संवाद कर एक नेटवर्क बनाती हैं। इस नेटवर्क का काम विशेष होता है। कुछ सोचती हैं, सीखती हैं और याद रखती हैं। अन्य कोशिकाएं हमें देखने, सुनने, सूंघने आदि में मदद करती हैं। इसके अलावा अन्य कोशिकाएं हमारी मांसपेशियों को चलने का निर्देश देती हैं।

अल्जाइमर रोग में दूसरे कामों पर भी असर पड़ता है। जैसे-जैसे नुक्सान बढ़ता है, कोशिकाओं में काम करने की ताकत कम होती जाती है और अंततः वे मर जाती हैं। अमूमन 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है।

डॉ. सूरी के अनुसार, अल्जाइमर पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकता, लेकिन मरीज के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है. ऐसी कई दवाएं हैं, जिनके द्वारा मरीज के व्यवहार में सुधार लाया जा सकता है. जिसमे सबसे महत्वपूर्ण है अपनों का प्यार और देखभाल,  अल्जाइमर मे जरुरत है अपनों के प्यार और देखभाल की

Memory loss and confusion are the main symptoms of Alzheimer's disease. No cure exists, but medication and management strategies can help you.

उन्होंने कहा कि कई प्रयासों से मरीज के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है जैसे व्यायाम, सेहतमंद आहार, उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण, डिसलिपिडिमा और डायबिटीज पर नियंत्रण और मरीज को बौद्धिक गतिविधियों में शामिल करना जैसे नई भाषा सीखने, मेंटल गेम्स या म्यूजिक में व्यस्त रखना.

आप माइंड मैनेजमेंट, हेल्दी लाइफ स्टाइल और नशे से दूरी जैसे एहतियात बरतकर अल्जाइमर और डिमेंशिया से बच सकते हैं। मानसिक संतुलन कायम रखने के लिए ध्यान (मेडिटेशन) करें और ईश्वर पर विश्वास रखें। किसी भी प्रकार के मादक पदार्थों की लत से दूर रहें।

दुनिया का हाल

  • 4.68 करोड़ लोग डिमेंशिया से पीड़ित
  • 7.47 करोड़ मरीजों की संख्या 2030 तक पहुंचने की आशंका
  • 13.15 करोड़ तक पहुंच सकती है यह संख्या 2050 तक

भारत की स्थिति

  • 40 लाख भारतीय डिमेंशिया से पीड़ित वर्तमान में
  • 16 लाख इनमें से अकेले अल्जाइमर के शिकार

एशिया में समस्या ज्यादा

  • 2.29 करोड़ डिमेंशिया के मरीज एशिया में
  • 98 लाख लोग दक्षिण एशिया में इस बीमारी से ग्रस्त
  • 1.05 करोड़ के साथ यूरोप दूसरे नंबर पर
  • 94 लाख इस बीमारी के शिकार अमेरिका द्वीप में
  • 40 लाख अफ्रीकी भी डिमेंशिया की चपेट में

अल्जाइमर्स डिजीज से पीड़ित रोगियों में चीन-अमेरिका के बाद भारत का नंबर है।

नया शोध - हल्दी कर सकती है मदद

गुणों से भरपूर हल्दी की एक और खूबी सामने आई है। नए शोध का दावा है कि भारत में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली हल्दी से बढ़ती उम्र में स्मृति को बेहतर करने के साथ ही भूलने की बीमारी अल्जाइमर के खतरे को कम किया जा सकता है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने डिमेंशिया पीड़ितों के मस्तिष्क पर करक्यूमिन सप्लीमेंट के प्रभाव पर गौर किया। करक्यूमिन हल्दी में पाया जाने वाला एक रासायनिक कंपाउंड है। पूर्व के अध्ययनों में इस कंपाउंड के सूजन रोधी और एंटीआक्सीडेंट गुणों का पता चला था। संभवत: यही कारण है कि भारत के बुजुर्गों में अल्जाइमर की समस्या कम पाई जाती है।

अल्जाइमर्स डिजीज से पीड़ित रोगियों की सुरक्षा का पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है. जिसमे परिजन पीड़ित रोगी की अधिक सहायता कर सकते है जैसे..

  • रोगी अक्सर घर से बाहर निकल जाते हैं और भटक जाते हैं। ऐसे में रोगी की जेब में पहचान पत्र रखें या उन्हें फोन नंबर लिखा हुआ लॉकेट पहनाएं।
  • रोगी अक्सर गिर पड़ते हैं और चोटिल हो जाते है। इसलिए रोगी को मजबूत छड़ी या वॉकर दें।
  • रोगी की दिनचर्या को सहज व नियमित रखने का प्रयास करें।
  • रोगी की देखभाल के दौरान उसके साथ पूर्ण संवाद बनाए रखें। रोगी को बताएं कि अभी समय क्या है, घर में कौन आया है और आप उसके लिए क्या करने जा रहे हैं।
  • पीड़ित व्यक्ति के प्रति धैर्य रखें।
  • मरीज को डराएं और डांटें नहीं।
  • व्यक्ति को अपना कार्य पूरा करने पर उसे उत्साहित करें या शाबासी दें।
  • अल्जाइमर्स डिजीज वाले व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और उसके साथ जो काम शुरू करें,उसे अंत तक पूरा करें।
  • इस रोग के कारण याददाश्त कमजोर पड़ जाती है। इस कारण व्यक्ति की जेब में हमेशा परिचय पत्र या घर का पता, कॉन्टैक्ट नंबर डाल कर रखें जिससे अगर उसे कोई समस्या होती है तो दूसरा व्यक्ति उसकी मदद कर सकता है।
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